
कभी बुरे वक्त में अंधा भी आसमान की तरफ देखता है। दरअसल उसे देखने का शौक नहीं हैं। इस जमाने ने उसे देखने के लिए मजबूर बना दिया है और यह बातें आज के दौर में जवान और खूबसूरत लड़कियों के साथ भी ऐसा ही करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। यह मैं नहीं 'वो' बोल रही है। और 'वो' के मतलब शायद आप समझ गए होंगे।
लाचारी, कमजोरी और खुदगर्जी और न जाने क्या-क्या की दंश झेलती हूं मैं। तुम तो मुंडा हो। तुम लोगों को तो यह सब देखने और करने में मजा आता होगा। है न! और शायद तुम भी इस जमाने के लोगों की इस हरकत से वाकिफ होओगे। जानते हो आज क्या हुआ। बस से आ रही थी। वो तुम रोज आती हो। इसमें नई बात क्या है। सुनो तो पागल बीच में टपक पड़ते हो। कभी-कभी मैं जब बोलती हूं तो ध्यान से सुन लिया करो। तुम्हें न मेरी हर बात मजाक लगती है। बोलो क्या हुआ! तुम न सुबह-सुबह मूड खराब कर देते हो। और बात भी कुछ ऐसा है आखिर मैं 'नजमा' होती कौन हूं आपको अपनी बात बताने वाली। मेरा रिश्ता ही क्या है। अब बस करो बाबा बताओ भी तो।
याद है तुम्हें मैं न एक बार बताई थी, मैं न जब भी (पटियाला) में 'मोडल टाउन से फुहारा चौक' के लिए बस लेती हूं तो उस में बहुत भीड़ होती है। हां याद आया! क्या हुआ? वो न आज भी उसी बस से आ रही थी। रोज की तरह आज भी बहुत भीड़ थी उसमें में। हालांकि मैं तो बैठी थी महिलाओं वाली सीट पर! क्या न, बगल वाली सीट पर बैठी एक कुडी को मुंडा बहुत परेशान कर रहा था। वो न कुछ अजीब हरकत कर रहा था। मैं तो शर्म से पानी-पानी हो गई। वो भी बेचारी क्या करती। किसी को बताती तो क्या बताती। वो मुंडा 'न' सीट से बिलकुल चिपका हुआ था। वो भी बेचारी क्या करती। शायद तुम समझ गए होंगे। वो क्या कर रहा होगा। और जानते हो मैं न इन्हीं सब के चलते मैं जब भी बस से उतरती हूं तो सबसे पीछे उतरती हूं।
इस जमाने के कुछ लोग बड़ी कमीने होते है। बस में बैटे तो वहीं हाल उतरते समय भी वहीं हरकत। आखिर वो करना क्या चाहते हैं। क्या तुम्हारे शहर में भी ऐसा होता है। और देखो न अगर कोई लड़की आ गई तो उसके लिए तुरंत सीट छोड़ देते हैं, लेकिन वही कोई आंटी हो तो देखो इनकी बिलकुल नवाब की तरह बैठे रहते हैं। क्या करोगे! यह सब होता है कभी कभी। यह बोल कर मैं फिर कहीं और सोचने लगा।
हे कुछ बोलो न! आज तुम चुप क्या हो। क्या कल मैं तुमको इंतजार करवाई उसका गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ। क्यों नाराज हो? अच्छे बच्चे नाराज नहीं होते। आखिर मैं क्या जान सकती हूं इस नाराजगी की वजह। यार 'पंजाब के लोग आते हैं देर से मगर आते जरूर हैं।' और आखिर मैं आई तो थी। कभी-कभी तो तुम भी लेट हो जाते हो। मैं नाराज नहीं होती। तुम किस दुनिया में हो आज, बोलते क्यों नहीं।
मुझे तो यकीन नहीं हो रहा है, जो शख्स मुझसे बात करने के लिए तड़पता था उसे आज हो क्या गया। कोई ये तो बताए। यह बोल कर उसने अपने चेहरे पर से केस हटाने लगी। मैं रह-रह कर यही सोच रहा था , कहीं चुप रहने की चाह कहीं हमसे छीन न जाए। यह सोच कर मैं बोल पड़ा! दोस्त आज मूड ठीक नहीं है। तुम न मुझे बहुत सपने दिखाने का ढोंग करते हो। तुम जो करो मुझे तो तुम्हारी तरसाने और तड़पाने की हरकत पर रोना आ आ रहा हैं। यह बोल कर वह रोने लगी।
आखिरकार मैं सब्र की सीमा तोड़ते हुए बोला। आपसे बात करने के लिए तो अभी सारी उम्र बाकी है 'पटियाला की महारानी साहिबा'। मैं गुस्सा नहीं। मैं अभी बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहा हूं। क्या मैं जान सकता हूं आज आपका डुपट्टा कहां हैं। इस पर उसने अपने आदत के मुताबिक चुलबुली अंदाज में बोल पड़ी! लाल डुपट्टा उड़ गया रे तेरे हवा के झोके से ! अच्छा बस करो !
और सुनो न एक बात और बताना मैं भूल गई थी। जानते हो तुम आए दिन मुझसे पूछा करते हो 'झूठ बोल रही हो या बहाना बना रही हो'। मैं न तुम्हारा फोन नंबर 'रानी' नाम से सहेज रखा है। तुम से तो नहींे लेकिन मां और पापा से कभी-कभी सिर्फ तुम्हारे खातिर झूठ और बहाना दोनों बनाना पड़ता है। क्या करूं लड़की हूं न। देखती हूं कल आजमा कर मुंडा में कितना है दम। ओके बाय! अपना ख्याल रखना! आप भी !! कल समय पर आ जाना ! 14 फरवरी है! मैं इंतजार करूंगी!!!
(अगला अंक बहुत जल्द)
रूमानी खयालों से जिंदगी नहीं चलती। आपकी सोच हकीकत की जमीन पर कहीं नहीं उतरती। क्यों इस जाल में जान बूझकर फंसते जा रहे हो। छोड़ो पटियाला कुछ सार्थक लिखो।
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