
अजीब दास्तां है ये! समझ में नहीं आता कि मैं इस कहानी को दोबारा कहां से शुरू करू। पटियाला की फिजा से या उस 'नजमा' की फरियाद से। यकीन मानिए अब तो वह बिल्लियों की
लड़ाई से ज्यादा नोंक-झोंक करने लगी थी वो!
इसे खुदा की कुदरत कहिए या पटियाला शहर(उसकी)की मेहरबानी मैं तो सिर्फ उससे 'पटियाला सलवार' 'पटियाला पैग' के बारे जिक्र किया था। लेकिन अब तो वह देश-दुनिया से लेकर
खुद को जानने की भी कोशिश करने लगी। मैं इसे उसका अनूठेपन मानू या कोई मंसूबा, गफलत,चालाकी, प्यार, मुहब्बत, इश्क, दोस्ती, वफा या उसकी इमानदारी। मुझे कुछ भी समझ
में नहीं आ रहा था। उसका कहने का सलीका भी कुछ-कुछ पहले के मुकाबले बदल गया था। देखते देखते चंद दिनों में वह मेरे लिए वह अचरज और प्रशंसा का सबब बन गई।
हालांकि इस बारे में कुछ भी कहना बेहद कठिन था। कहा जाता है कि आज का युग छवि छलावे का युग है। आदमी की पीड़ा, उसके झूठ और फरेब से पूरा सामाजिक तंत्र घिर चुका है।
ऐसे में मेरे सामने अजीबोगरीब स्थिति उत्पन्न हो गई। आखिर मैं पल-पल अपने आपको मुश्किल में फंसता जा रहा था। फिर भी मैं यह सोच कर कुछ नहीं कर पा रहा था कि
संवेदनशील सहित अनेक मुददों और रिश्तों को बताने वाली बातों को सुनने और सहयोग करने में हर्ज क्या है।
अब तो आए दिन नींद में भी महफिल के कहकहों के डूबने का इंतजार किए बिना उनकी खनकदार आवाज गुंजने लगी थी। गंभीर से गंभीर विषयों हो या कोई अन्य वाक्या पर भी उसका
जिक्र करने का दिलचस्प अंदाज का मैं कायल हो चुका था। ऐस में हमेशा अब यही बोलता था , जब कोई बात बिगड़ जाए कोई मुशिकल आ जाए। तुम देना साथ मेरा!! हालांकि इससे
पहले ऐसे-वैसे मौको पर मैं खुदा को याद करता था।
अपनी मजाक की आदत के मुताबिक आखिरकार मैने एक दिन तहजीबी अंदाज में बोल दिया। क्या रखा है पटियाला में? इस बात का जवाब उसने बड़े दिलचस्प अंदाज में दी। जी
"खाकसार का नाम 'नजमा बानो' है। मैं अपने बुरे हाल के बारे में किसी से नहीं बताना चाहती। लेकिन, खुदा तो खर मुसलमॉं, तुमसे शिकवा क्या? अब आप मेरे एक अच्छे दोस्त है।
मैं आपसे इस लिए बात करती हूं कि मैं अपने नाकाम जिंदगी को सब्र दिला सकू । दोस्त मेरे दिल में छुपा दर्द आज भी सर्द नहीं हो पाया है। तुम पटियाला क्या देश-दुनिया के बारे
में बहुत कुछ पूछ सकते हो, लेकिन दोस्त अब मेरे बारे में और ज्यादा मत कुछ पूछना।
मैं तो आसमान से टूटा हुआ तारा हूं। और हां टूटे हुए तारे से प्रकाश की उम्मीद नहीं की जा सकती। जाने-अनजाने अगर मैं कुछ गलत बोल दिया हूं तो माफ करना। अच्छा जी !! यह
बात सुन कर मुझ में अफलातूनी दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। क्या मुसीबत का मारा मुसाफिर ऐसे होते है। अभी-अभी तो जिंदगी की गाड़ी उमंगों की पटरी पर खरपट ढ़ग से दौड़ रही
थी। यह क्या हो गया। मुझे और जानने की भूख बढ़ती जा रही थी। ऐसे में मैंने निहायत संजीदगी से कहा! बदकिस्मत तो मैं भी हूं माशा अल्ला! इस पर वह बोल पड़ी क्यों तुम्हें क्या
हुआ? मैडम आज नहीं कल बताऊंगा! अच्छा जी!!
अगला अंक बहुत जल्द!!
जारू रहिये-अगली कड़ी की प्रतिक्षा.
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