शनिवार, जून 13

सपने और यथार्थ की जंग में 'वो'!! (नजमा पटिया अंक -8 )


हिचकिचाते हुए लब-ओ लहजे में वो (नजमा) बोली ! प्लीज आज उसके बारे में जानने की जिद न करो। किसी और दिन बता दूंगी। हालांकि अब मुझे बताने में निगाहे शर्म से झुकी जा रही है!! और दूसरी बात यह है कि अब मेरी लाइफ में 'पैगामे गम' के अलावा कुछ नहीं बचा है।

उस वक्त बुजुर्गाना लहजे में बनावटी गुस्सा कर के बोल पड़ा था। तू जो अच्छा समझों यह तूझ पर छोड़ा हूं। बताओं या न बताओं यह तो आपकी मर्जी है।
यकीनन तुम जो हो न बहुत बेरहम हो !!
आखिकार नेकनीयती से अपनी कहानी शुरू की !

कहां से शुरू करू?वह मेरा पड़ोसी था। और जब मैं 11वीं में पड़ती थी तो वो संयोग वश मेरा सहयोगी बन बैठा। और तुम यह मत पूछना वो किस प्रकार बन गया? वो न! हौंसल है तो उम्मीदे हैं, उम्मीदें हैं तो रास्ते है, रास्ते है तो मंजिलें है और मंजिले हैं तो कामयाबी हैं। जीतने के जज्बे को बयां लाइनें शुरुवात में बिलकुल रटे रटाये अंदाज में बोल कर मुझे जाल में फंसाया था। उस वक्त मैं बिलकुल फिदा हो गई थी।

दूसरी वजह एक और थी उसके पिजाजी भी मेरे पिताजी के दफ्तर में नौकरी किया करते हैं। इस वजह से हमदोनों में दिन ब दिन दोस्ती बढ़ती जा रही थी।

जानते हो! एक वक्त था जब हम दोनों दिन के उजाले से रात के ग्यारह बारह और कभी कभार तो रात के एक बजे तक उसके संग साथ-साथ दिन बिताया करते थे। और तो और नशीली राते , बीमार दिन, सूनी दुपहरिया और क्या बोलू हर वक्त सवालों से लड़ते-झगड़ते समय कट रहा था।

मैं समझती हूं कि अब बताने की जरूरत नहीं । इसके पीछे वजह क्या रहा होगा। हालांकि कभी कभार हमदोनों में कुछ बातों का लेकर शुरू से ही रिश्ते बनते बिगड़ते रहते थे। कई बार तो पसंद -नापसंद को लेकर झगड़े भी हुए भी थे।

उसका अक्सर मेरे सामने बड़ी-कड़ी बातें करना फितरत थी। वो नैतिकता एवं आदशरे की बात किया करता और तो और . उसमें गजब का सेंस ऑफ ह्मूर था। शुरूआत में वो 'आफताब' था ।

आखिर में एक वक्त ऐसा आया ,जो अक्सर होता है। वह पूरी तरह एकतरफा प्यार में मेरे जिस्म को देखकर बोराता जा रहा था। वह अब अक्सर अविश्सनीय नजरों से देखने लगा था। फिर भी उस वक्त तक उसके प्रति बड़े ऊंचे और पवित्र विचार मेरे मन में थे।

पूरे एक घंटें की मुसलसल खामोशी से यह सारी बातें सुनता जा रहा था। उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। हालांकि इस दुनिया में आए हुए 25 साल ही हुए थे। और उन 25 सालों में बेहद किस्म के दुख-दर्द, हर्ष-विषाद, अपमान और सुख और न जाने क्या-क्या के अनुभव हासिल कर चुके थे। इसमें और कुछ बाते शामिल करना चाहता हूं। नाते रिश्तेदार और करीबी मित्रों के छल-कपट भी थे। प्यार की गर्मी और ताकत, बेवफाई से संगदिल और अनगढ़ टुकड़े भी थे। लेकिन यह कहानी कुछ अलग था।

उसकी यह बात सुन कर अवाक रह गया जब वह यकायक हसीन तरीके से फुसफुसती हुई बोली कि इस प्रकार के तीन और हैं? उस बक्त और जानने की उत्सुकता को कब पाला मार चुका था मालूम नहीं चला। 'दूसरे लहजे में बोलूं ' हालांकि अब और जानने की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी।

तुम नहीं जानते हो। यहां के कुछ लोग बहुत बेरहम होते हैं। सच्चे दोस्त नहीं बनते । एक दूसरे से केवल मतलब का रिश्ता रखते हैं। तुम्हें एक चीज और बता दूं। यह मेरा निजी अनुभव है इस शहर के लोग आपसी हित देखर दोस्ती करते हैं।

उफ!! हसीन यादे । बस , आज उससे ऐसी नफरत है कि तुम यकीन नहीं करोंगे। उम्र भर के लिए उससे अजनबी बन गई हूं। उस तकलीफदेह दौर से अभी भी उबर नहीं पाई हूं।

ऐसा क्या किया उसने? अब आज नहीं कल!!

अगला अंक बहुत जल्द (अंधेरी रात में , मंसूबे हुए नहीं पूरे !!)

फोटो गूगल ?