रविवार, जुलाई 19

"नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"!! ( अंक-2) '!!!

नोट-भले ही ये कहानी सच के करीब लगे लेकिन यहां ये कहना लाजिमी है कि इसका किसी लड़की , घटना से सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है। कहानी में आई घटना का किसी लड़की-विशेष की जिंदगी से मिलना महज संयोग हो सकता है।
एकदम रापचिक मुंबइया *मुलगी*, बिलकुल बेबाकी भरा, एक एक शब्द स्पष्ट और ऐसा दिलकश मानो शब्दों में ही सारी अक्ल.उकेरा गया हो। लवों की शान बढ़ाने वाली भाषा अंग्रेजी, may i talk to Mr.***'
यह अजीब बात है कि उस वक्त नींद में था और मुंबई से उसका फोन जानते हुए भी पूछ रहा था आप कौन और कहां से बोल रही हो? और वह भी बहुत ही अजीब तरीके से । यह भूल गया था कि यह कॉल वहीं मुलगी पूजा (नाम बदला हुआ) की है जो "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"!! वाली बात बोलती थी।


हालांकि वह बताने की कोशिश कर ही रही थी कि मेरा "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली" की ख्वाहिश पूरी हो गई। लेकिन अब उस गहरी नींद को कौन कहे। लिहाजा वह सारी बातें बोल चुकी थी। ऐसा लगा "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली" आ गया। फिर बार-बार बारीकी से याद करने के बाद *यादों का बुखार* दिल बे खबर, खनकदार आवाज कट गया/

जब नींद खुली तो गलानी फिल हुआ कोई शहरी बाबू का अंदाज नहीं, किसी गांव के गवारा और अनपढ़ था/

यह वह एक पल का किस्सा है ? मात्र 3 मीनट के लिए मिले थे एक दूजे से वो भी 28 जून को। उसके बाद वो नजरों से ओझल हो गई। दो दिन बाद यानी 30 तारीख को रात 12 बजे के करीब उसका फोन आया।

एका- एका ऐसी यादें मानों जैसे ऑखों के सामने एक इश्तहार सामने से गुजरा हो। जींच, टी शर्ट कम्फर्टेबल परिधानों वाली में बिलकुल सजी धजी मोहतरमा का चेहरा ऑखों के सामने चेहरा धूम गया हो। दिल्ली महानगर की आवोहवा ने उसे रंगीनियों के बीच आगोश में ले लिया।

बात वह फुरसत का वक्त काटने या दिल बहलाने वाली बात नहीं थी। लवों से निकली हुई हर बात हद्य को कचोटने, पिछले 24 सालों के दौरान पढ़ी और लिखी गई वुद्धि को झंकझोड़ कर रख देने वाली थी।

यह कहना मुफीद न होगा 24 साल का एक लड़का नींद में नासमझी में कुछ बोल दें। फिर नाउमीदों के अंधकार के बीच बैचनी को राहत देने के खातिर मेल किया। लिहाजा यह बैचनी के लिए थोड़ी देर के लिए राहत भर थी। मेल में क्या लिखू समझ में नहीं आया।


क्या वो मुलगी अपनी तुनुकमिजाज आदत के कारन फोन काट दी थी । यह हो सकता है कि पहली नजर में यह सत्तर के दसक का विचार हो। पर इसमें कोई शक नहीं वह अकेली है पर अजनबी नहीं। बड़ी खूबसूरती से उसे बोल गई टूटी फूटी अग्रेजी की बखिया उधेड़ते हुए।

अगले दिन जीमेल पर नज़र घूमी तो .. *** तो वह ऑनलाइन थी/

सहजता से बोली, खुशी की जो हिलोरे हैं, बस "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"! यू नो, बचपन से ही मुझे घूमने का मौका मिला। मैं कई जगह रही, कभी नासिक, कभी पुणे, कभी बंगलौर, तो कभी मुंबई। इन सारे स्थानों के माहौल भाषा, खान-पान पहनावा, रहन सहन हर चीजों में नवीनता देखने को मिली। लेकिन एक चाहत अधूरी रह गई थी। लेकिन अब ख्वाहिश "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"! का इंतजार है और वह घड़ी एक अगस्त को आने वाली है।



कभी सहज व सही ढंग से विकसित होने के लिए आपसी देखभाल , वश्विस को निभाने की भावना व साथी की भावनाओं को समझने की जरूरत होती है। यह काबिलेगौर था। यूं तो दुनिया में खूबसूरती के हजारों किस्से मशहूर हैं। लेकिन यह यह कुछ अलग था?

फोटो गूगल **

शुक्रवार, जुलाई 10

"नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"!!


नासिक, पुणे, बंगलौर, मुंबई और अब ख्वाहिश "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"!! नाम रूपा (नाम बदला हुआ) । नाम के मुताबिक शक्ल। ऑखों में बालसुलम चमक। असाधरण हेयर स्टाइल, मोहतरमा की चाल-चलन, हाव भाव बिलकुल परियों की शहजादी जैसी।

शांत महौल। शाम चार बजे का वक्त। संस्थान में उस वक्त ज्यादातर छात्र अपना इंटरव्यू दे कर रूखसत हो चुके थे। बहुत कम छात्र रह गए थे जिनका इंटरव्यू बाकी रह गया था। हालांकि जो रह गए थे उनमें थकान और उदासीनता एक साथ तारी हो चुकी थी।

हर कोई हड़बड़ी में यूं था ऐसा लग रहा हो हर किसी का ट्रेन छूट रही हो। हर कोई अपने स्टॉप पर पहुंचने की जल्दी में हो। लेकिन भीषण गर्मी के बीच संस्थान के गेट के चौराहे पर खड़ी हो कर शायद वो किसी का इंतजार कर रही थी। एक हाथ में बैग और दूसरे में फाइल सहजे इस गेट से उस गेट इस तरह चहलकदमी कर रही थी मानो सुबह के सैर सपाटे पर निकली हो।

तभी उसके उपर नजर पड़ी। यूं तो उससे पहले भी फुर्सत के क्षेणों में उसे ताक रहा था। ताकने का अर्थ उसके प्रति गलत दुश्चिंता नहीं छिपी थी। बल्कि बेचैन कर देने वाली चहलकदमी पर कुछ तरस और कुछ जानने की इच्छा हो रही थी।


उसकी बेचैनी देखकर आखिरकार उत्सुक शुभमुहूंर्त देखकर लेकिन भर्राई आवाज में उसकी स्थिर खामोशी तोड़ते हुए पूछा? क्या आपका इंटरव्यू हो गया?

उसने अत्यंत संयत और सधे हुए लहजे में इंग्लिश की झप्पी मारते हुए बोली, 'यस! क्या आपका इंटरव्यू हो गया। आपका कैसा गया। मैं तो बहुत डर रही थी। लेकिन वैसा कुछ नहीं रहा। हालांकि मेरा एक नहीं दो -दो जगहों पर हुआ है। '

यह सारी बातें एक ही सांस में बोल कर उसने सोचने के लिए मजबूर कर दिया। हालांकि उसे बताया 2005-06 बैच का हूं तो उसने अत्यंत आहिस्ता से बोली सर, क्या आप अपना फोन नम्बर देंगे। मेरा 'नेक्स्ट स्टॉप यू नो .दिल्ली' हीं हैं।


ऐसा लगा वहां पर कुछ बैठे लोग शक कर रहे हैं। वो यह सोच रहे हो लड़का मन बहलाव के लिए पूछ रहा है। हालांकि नजरअंदाज करते हुए पर्स से अपना कार्ड निकाला और थमा दिया। बिलकुल एक शब्द बोली, थैंक्स!! वो भी बेइन्तिहा खुशी जाहिर करते हुए।

फिर बड़े दिलचस्प अंदाज में मुंबईयां स्टाइल में बोली नये शहर के नये महौल में एक अजनबी से बात करने का मजा ही कुछ और है। तभी उसकी गाड़ी आ गई। फिर बोली ओके सर फिर मिलती हूं तो पिछले स्टॉप की कहानी बताऊंगी अभी तो "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली" वाय! टेक केयर!

गुडबाई शहजादी! देखेते देखते यादों के झरोखों में चली गई। आखिर इंतजार है "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली".का लेकिन उसके बाद नेक्सट स्टॉप कहां*****
फोटो गूगल

शनिवार, जुलाई 4

" आखिर रात के अंधेर में वो कौन है " ! (नजमा पटियाला अंक-9)


अब मैं समझती हूं कि तुम समझ गए होगे कि उस रात उसके मंसूबे क्या थे।
उस दिन के बाद मैं उससे दूरी बना ली। हालांकि उसने बहुत कोशिश की लेकिन अब मैं अब उससे भुलाना चाहती थी।

क्या कुछ समझा नहीं !! ओ हो.,सुनो, 7 मार्च 2009 की देर रात की बात है। अपनी सहेलियों के साथ काली मंदिर से लौट रही थी। तभी एक कोने में कोई नजर आया। हालांकि नजरअंदाज करती हूई दस-पांच कदम आगे बढ़ गई। फिर यह सोच कर पिछे मुड़ी की आखिर रात के अंधेर में वो कौन है !

देखन में चेहरा मासुमियत सा, कुछ देर के लिए मैं यह बोलू कि सूफियत का, अदब इंसानियत का। लेकिन इस रात के अंधेरे में वो भी हाथ में 500 का नोट लहरा रहा हो। यह बात में समझ में नहीं आ रही थी। मकसद क्या हो सकते थे। हालांकि मैं डर रही थी , फिर भी, नजदीक जा कर देखी तो वो दूसरा कोई और नहीं अरुण था।


जानते हो उसके बाद -उसके अपने सफाई में मुझे से क्या बोला !
नजमा -शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए। पीने वाले तो वाकई जिंदगानी ही पीते हैं। यार मैं ने शराब पी ली थी। यू तो पटियला में युवाओं में वक्त वेवक्त मौकों पर यह वाक्य बड़ी ही अनोखे अंदाज में बोली जाती है। हालांकि शराब के वो आदि नहीं कुछ अन्य मामलों में भी वो इस वाक्य को उकेरने से नहीं चुकते। हालांकि उसने चालाकी दिखाने की बहुत कोशिश की।



मैं मानती हूं उसके पहले उस लंपट ,कमीने में अभी दिल्ली और पंजाब छाप लड़कों की तरह उसके पंख नहीं उगे थे। हालांकि देखने में और चाल ढाल से एक समय बड़ा आदर्शवादी था।

हर रात की इच्छाएं मेरे लिए जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन गई थी। शायद तुम समझ गए होंगे। उसे विक्षिप्त मन-स्थिति मानकर उसकी तरफ ध्यान देना ही छोड़ दी थी अब।



तुम जानते हो एक वक्त था जब उसका बचपना और भोलेपन वो एक लम्हा उसकी वो एक नजर ने मेरी जिंदगी के मायने बदल दिए थे, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो चुका था।

उस दिन के बाद ,पैसा, एश्वर्य , संसाधन , रौनक और इनके बीच बेतहाशा भागती जिंदगी के बीच अपनों और गैरों की बईमान नीयत से तंग हो गई थी।

अब तो ऐसा एहसास हो रहा था मानो बाजार की जरूरत के मुताबिक अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए बाजारू औरत बन गई हूं। हालांकि यह बातें गंभीरता से सोचने के बाद ऐसा लगने लगा था। मैं पंजाब की हूं, आजाद ख्याल की हूं। लेकिन इस जमाने के कुछ लोगों से दोस्ती और संवादों के जरिए अब नौसिखिए बाजारू औरत से कम नहीं रह गई थी। यार मेरी जिंदगी में अब बचा क्या है। इस उम्र में सारा उत्साह तो अब धूल चाट रहा है। यह तुम्हें इस लिए बता रही हूं कि अब अपनी मुसलसल दबी हुई इच्छाओं को दबा कर नहीं रखना चाहती।

अगर यह बोलू कि पिछले दो साल की पेशेवर जिंदगी के कुछ खट्टे मिठ्ठे अनुभव और किसी के जीवन के यथार्थ को परोसना अब भारी पड़ने लगा था।


कुछ देर खामोशी के बाद एक बार फिर अपनी कहानी शुरू कि अब ऐसा बहुत कम होता था कि कहीं से गुजरे और लोग पीछे मुड़कर न देखें। हर तरफ से उंगली उठती। अब लोगों के बीच मेरे चरित्र के बारे में यह चर्चा आम हो चुकी थी। यादों को अपना वजूद था, उनमें जो जिन्दगी जी थी, सपने देखे थे, सफर तय किए थे, किले फतह किए थे, सीमायें लांधी थी वक्त वे वेवक्त पार्क की बेंच पर एक दूसरें का इंतजार किया करती थी। सारी बाते अब अब एक यादें बन कर रह गई थी। मेरी जिंदगी की राह अलग राह पर चल रही थी। हालांकि मुझे इस बुरे हालात का मलाल था।

यह लोगों के बीच बोला जाता है कि खतरनाक सपनों का मर जाना अच्छी बात नहीं हैं।
उसने यह बता कर हैरान कर दिया कि मैं उसके बारे में सब कुछ जान गई थी। एक अच्छे दोस्त का मायने क्या होता है उसका बिस्तर गर्म करना भर थी।

जानते हो ,फिर अचानक एक दिन वो बस स्टॉप पर मिल गया और बताने लगा। (अगला अंक बहुत जल्द)***