
कहने को तो लोग कह देते हैं 'दिल्ली है दिलवालों की' आ कर देख तो लो लेकिन दिल्लीवालों का दिल अब दिल्ली में नहीं पंजाब में जम रहा है। वो मैं नहीं बोल रहा हूं दरअसल आजकल 'दिल्लीवालों' का दिल बोल रहा है।
यूं तो दिल्ली और पंजाब का अटूट रिश्ता रहा है-यह बताने की जरूरत मैं नहीं समझता हूं। बतलाना यह जरूरी है कि दिल्लीवालों का दिल पंजाब में क्या और किस चीज पर जम रहा है। दरअसल आज कल दिल्ली में शाही हो या साधरण, अमीर हो या गरीब, शादी हो या कोई अन्य पार्टी उसमें पीने-पिलाने की रंगीन महफिलों में पटियाला पैग और वहां की सलवार की धूम मची हुई है। और यह बात मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं। हालांकि इसके पीछे वजह जो भी रही हो।
इस बारे में दिल्ली के गोरे-गोरे से छोरों का मानना है 'भाई बताने का नहीं' सुनने का पटियाला पैग बोले तो शराब। और हा चढ़ता बहुत जल्दी है। भाई मैं तो पटियाला पैग का नाम सुनते ही पागल हो जाता हूं। वहीं दिल्ली की कुड़ियां बोलती हैं 'भइया नजर नहीं आती आपको पटियाला सलवार बहुत जल्दी उतरती है'।
भाई इन दोनों चीजों का सुरूर सिर्फ युवा प्रेमी जोड़ों पर ही नहीं अधेड़ उम्र के लोगों (ताऊ जी)और शादीशुदा जोड़ों के साथ-साथ आज कल में बनने वाली दुल्हनिया का तो मत पूछो। इनको पटियाला सलावार पहन कर पंजाबी कुड़ी बनने का खुमार चढ़ा हुआ है। वहीं बालीवुड की हसीनाओं भी पंजाबी बेबाकी लहजा और पटियाला सलवार पहन कर जम कर मजे ले रही हैं। दूसरी ओर फिल्म निमार्ता भी अपनी फिल्मों में पंजाब रंगत का छाप खूब मजे से परोस रहे हैं।
इस बारे में पटियाला के लोगों का क्या मानना है। पटियाला की एक कंपनी में जॉब करने वाली सोडी 'नजमा' ने बताया कि 'की बोलना दिल्ली वाले मुंडे तो 'वसंत', 'सुरा' और 'सुंदरी' के लिए दिल्ली छोड़ पटियाला में घूर रहे हैं। वो अपनी राह तलाश रहे हैं। यहां मै यह बताना जरूरी समझता हूं कि 'सुरा' का आशय शराब से है और सुंदरी का मतलब 'कुड़ी'। उसी के शब्दों में लाहौल-विला, आए हाय, दिल्ली मुडा साड़ा डोली चढ़ गया बैंड बज गया पटियाला में।
खर मैं कोई लखनऊ का मुशयारा नहीं कर रहा हुं। लेकिन नजमा जी से जब मैने अपने बारे में बात कि तो उस सोडी ने बड़ी ही बिंदास लहजे में बोली ओए मुंडे फिल्म 'देव डी' नहीं देखी? पंजाब की कुडी पटाखा होनी हैं। ये पंजाब हेनु कुड़ियां गóो की खेत में लेजाने से भी परहेज नहीं करती। यह बात सुन कर मैं व्यथित हो गया। हालांकि मैं भी हार नहीं मानने वाला था। संजीदगी से मैने भी चुटीला संवाद शुरू किया और बोला 'मैडम जी' बस करो अब मार ही डालोगे क्या?
इसके बाद तो वह सचमुच पंजाबी सोडी पटाखा बन गई। बोलती है ओए मुंडे पटियाला आ कर तो देखो। जिस प्रकार कराची की सर्दी और विधवा की जवानी जो देखता है ठिठक कर रह जाता है उसी प्रकार पटियाला की कुडी को देखर पागल बन जाओंगे। और क्या पूछता, सोचा अब बाद में बात करेंगे। अभी शांत रहने में ही भलाई है। यही सोचकर मुझे एक कहावत याद आई 'अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा है'। बहरहाल खूबसूरत मोड़ का सवाल है तो अर्ज करना चाहता हूं । पटियाला की कुडी !! अब बस करो ! बच्चे की जान लोगे क्या?
दूसरा भाग बहुत जल्द ***