शुक्रवार, मार्च 13

"वो " आज बोलता क्यों नहीं !!! (अंक -4)


कभी बुरे वक्त में अंधा भी आसमान की तरफ देखता है। दरअसल उसे देखने का शौक नहीं हैं। इस जमाने ने उसे देखने के लिए मजबूर बना दिया है और यह बातें आज के दौर में जवान और खूबसूरत लड़कियों के साथ भी ऐसा ही करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। यह मैं नहीं 'वो' बोल रही है। और 'वो' के मतलब शायद आप समझ गए होंगे।

लाचारी, कमजोरी और खुदगर्जी और न जाने क्या-क्या की दंश झेलती हूं मैं। तुम तो मुंडा हो। तुम लोगों को तो यह सब देखने और करने में मजा आता होगा। है न! और शायद तुम भी इस जमाने के लोगों की इस हरकत से वाकिफ होओगे। जानते हो आज क्या हुआ। बस से आ रही थी। वो तुम रोज आती हो। इसमें नई बात क्या है। सुनो तो पागल बीच में टपक पड़ते हो। कभी-कभी मैं जब बोलती हूं तो ध्यान से सुन लिया करो। तुम्हें न मेरी हर बात मजाक लगती है। बोलो क्या हुआ! तुम न सुबह-सुबह मूड खराब कर देते हो। और बात भी कुछ ऐसा है आखिर मैं 'नजमा' होती कौन हूं आपको अपनी बात बताने वाली। मेरा रिश्ता ही क्या है। अब बस करो बाबा बताओ भी तो।

याद है तुम्हें मैं न एक बार बताई थी, मैं न जब भी (पटियाला) में 'मोडल टाउन से फुहारा चौक' के लिए बस लेती हूं तो उस में बहुत भीड़ होती है। हां याद आया! क्या हुआ? वो न आज भी उसी बस से आ रही थी। रोज की तरह आज भी बहुत भीड़ थी उसमें में। हालांकि मैं तो बैठी थी महिलाओं वाली सीट पर! क्या न, बगल वाली सीट पर बैठी एक कुडी को मुंडा बहुत परेशान कर रहा था। वो न कुछ अजीब हरकत कर रहा था। मैं तो शर्म से पानी-पानी हो गई। वो भी बेचारी क्या करती। किसी को बताती तो क्या बताती। वो मुंडा 'न' सीट से बिलकुल चिपका हुआ था। वो भी बेचारी क्या करती। शायद तुम समझ गए होंगे। वो क्या कर रहा होगा। और जानते हो मैं न इन्हीं सब के चलते मैं जब भी बस से उतरती हूं तो सबसे पीछे उतरती हूं।


इस जमाने के कुछ लोग बड़ी कमीने होते है। बस में बैटे तो वहीं हाल उतरते समय भी वहीं हरकत। आखिर वो करना क्या चाहते हैं। क्या तुम्हारे शहर में भी ऐसा होता है। और देखो न अगर कोई लड़की आ गई तो उसके लिए तुरंत सीट छोड़ देते हैं, लेकिन वही कोई आंटी हो तो देखो इनकी बिलकुल नवाब की तरह बैठे रहते हैं। क्या करोगे! यह सब होता है कभी कभी। यह बोल कर मैं फिर कहीं और सोचने लगा।

हे कुछ बोलो न! आज तुम चुप क्या हो। क्या कल मैं तुमको इंतजार करवाई उसका गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ। क्यों नाराज हो? अच्छे बच्चे नाराज नहीं होते। आखिर मैं क्या जान सकती हूं इस नाराजगी की वजह। यार 'पंजाब के लोग आते हैं देर से मगर आते जरूर हैं।' और आखिर मैं आई तो थी। कभी-कभी तो तुम भी लेट हो जाते हो। मैं नाराज नहीं होती। तुम किस दुनिया में हो आज, बोलते क्यों नहीं।

मुझे तो यकीन नहीं हो रहा है, जो शख्स मुझसे बात करने के लिए तड़पता था उसे आज हो क्या गया। कोई ये तो बताए। यह बोल कर उसने अपने चेहरे पर से केस हटाने लगी। मैं रह-रह कर यही सोच रहा था , कहीं चुप रहने की चाह कहीं हमसे छीन न जाए। यह सोच कर मैं बोल पड़ा! दोस्त आज मूड ठीक नहीं है। तुम न मुझे बहुत सपने दिखाने का ढोंग करते हो। तुम जो करो मुझे तो तुम्हारी तरसाने और तड़पाने की हरकत पर रोना आ आ रहा हैं। यह बोल कर वह रोने लगी।


आखिरकार मैं सब्र की सीमा तोड़ते हुए बोला। आपसे बात करने के लिए तो अभी सारी उम्र बाकी है 'पटियाला की महारानी साहिबा'। मैं गुस्सा नहीं। मैं अभी बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहा हूं। क्या मैं जान सकता हूं आज आपका डुपट्टा कहां हैं। इस पर उसने अपने आदत के मुताबिक चुलबुली अंदाज में बोल पड़ी! लाल डुपट्टा उड़ गया रे तेरे हवा के झोके से ! अच्छा बस करो !

और सुनो न एक बात और बताना मैं भूल गई थी। जानते हो तुम आए दिन मुझसे पूछा करते हो 'झूठ बोल रही हो या बहाना बना रही हो'। मैं न तुम्हारा फोन नंबर 'रानी' नाम से सहेज रखा है। तुम से तो नहींे लेकिन मां और पापा से कभी-कभी सिर्फ तुम्हारे खातिर झूठ और बहाना दोनों बनाना पड़ता है। क्या करूं लड़की हूं न। देखती हूं कल आजमा कर मुंडा में कितना है दम। ओके बाय! अपना ख्याल रखना! आप भी !! कल समय पर आ जाना ! 14 फरवरी है! मैं इंतजार करूंगी!!!

(अगला अंक बहुत जल्द)

शनिवार, मार्च 7

उसे" दिल के नगमों को कैसे सुनाऊं !!! (अंक-3)


दिन के 11 बज चुके थे। कुछ अनहोनी के डर से मेरा दिल धुक-धुक कर रहा था, पता नहीं वह आएगी या नहीं। कहीं कुछ अपनी जिंदगी से कुछ कर बैठी क्या? हालांकि कल जाते वक्त वह बोल कर गई थी, सोमवार से मैं नहीं आ पाऊंगी, लेकिन आप से कुछ विशेष बात करनी है इसलिए मैं जरूर आऊंगी।

मेरे मन में उसके प्रति आज अनेक तरह के गंभीर बाते आ रही थीं। कभी-कभी मैं यह सोचकर परेशान हो रहा था। क्या वह पागल है या मैं पागल हूं। जो भी रहा हो, भले ही किसी मुद्दे को लेकर हमदोनों में नोंक-झोंक होती हो। लेकिन शाम होते होते और-घर जाते समय अक्सर हमदोनों एक-दूसरे की गलती माफ करके यह बोलना नहीं भूलते थे कि अपना ख्याल रखना।

अब तो यह रोज की आदत बनती जा रही थी। यह बात मुझे नहीं मालूम की यह बात मैंने शुरू की थी या उसने। वहीं दिन भर हम दोनों के बीच यह आरोप खूब लगते थे कि आप कौन होते हो यह सब जानने वाले। जबकि मैं उसे और वो मुझे यहां तक बताने से परहेज नहीं करते थी कि आज मैंने क्या खाया है, तुम्हारा शर्ट का बटन किस रंग का है, तुम आज बस से सफर कर रहे थे, उसका नम्बर क्या था। यह जानकर क्या करोगे, इतना सब कुछ होने के बावजूद वो मेरा और मैं उसका उसका हमेशा एक दूसरे की भावना का कद्र किया करते थे।


जनवरी के महीने में भी उसके इंतजार ने मुझे गर्मी का आभास दिला दिया था। मैं अपनेआप को बिल्कुल अकेला और असहाय अनुभव कर रहा था। हालांकि मुझे याद नहीं किसी ने मुझे कहा था,' जिंदगी में अगर कभी कोई साथ न हो तो खुद को ही अपना दोस्त समझना। खुद ही अपना दुश्मन और खुद ही अपना सच्चा दोस्त होता है'। शुरूआती दिनों में जिस 'नजाम' के बेलाग और बेबाक अंदाज से मैं अक्कसर डरता था। मुझे अब ऐसा लगने लगा था, बेबजह मैं डरता था।


बहरहाल इतना होने के बावजूद क्या गुंजाइश है उसमें सब्र दिलाने का। अभी यह सोच ही रहा था कि मेरे कानों में एक दिलकश आवाज आई 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, कांटो पे चलके मिलेंगे साए बहार के'। यह आवाज भले की किशोर दा की रही हो। लेकिन अभी जो मैं आवाज सुन रहा था उसी 'नजमा' की थी। अपनी आदत के मुताबिक वह बिंदास अंदाज में बोली। "हाय, क्या हाल है। अपना चेहरा आईना में देखा है। ब्रेकफास्ट किया की नहीं। आज बस से आया। कोई परेशानी तो नहीं हुई थी, घर में तो सब ठीक है। आप जानते हो आज कालेज में डिग्री लेने चली गई थी सो रास्ते में लेट हो गई। और यह बात मैं कल बताना भूल गई थी। एक ही सास में बोल गई। और उसके सारे सवालों का जवाब मैं भी एक ही सास में उसी के अंदाज में दे दिया।

दूसरी लड़कियों की तरह वह भी व्यथित हो कर बोली, 'मैं नहीं आई थी तो तुम क्यों नाराज हो रहे थे'। आखिर आपकों क्या लेना देना है मुझ से। मैं भी अपने पैतरे बदलते हुए अपने लहजे में बोला बहुत 'बावरी' हो तूम। भगवान का शुक्रगुजार हूं तुम आ गई वरना मैं आत्महत्या करने वाला था। इस पर बोल पड़ी, यह तो आपकी मर्जी है आप जो करो। आप आत्महत्या करों या और कुछ और मुझे क्या लेना देना। इसके बाद उसने सब्र तोड़ते हुए बोल पड़ी आपके दिल में आत्महत्या करने के विचार कब से आए, यह तो मेरे दिल में था। और यह विचार तो बड़े ऊंचे और पवित्र हैं। बहुत विचित्र हो इंसान हो आप। मुझे तो आप पर हसी आती है। अगर यह बात सही है तो मैं यह सारी बाते तुम्हारे घर वालों को बता दूंगी।

दोबारा यह सब बोला न तूम समझ लेना। अब मैं जो फिर से एक खुशनुमा दुनिया में लौटी हूं वह सिर्फ तूम्हारे वजह से और तूम यह बोल रहे हो। मैं कहीं भी रहूं, मुझे अपने पास ही पाओगे। मैं भी उसी के लहजे में जवाब दिया, 'हे सुनो ना' 'मैं न तो तुम्हारे साथ रह सकता हूं और न ही तूम्हारे बगैर'। तुम में इतनी कशिश है कि तुम्हारे साथ मैं नहीं रह सकता। ओए पागल हो क्या। तुम भी कम नहीं हो। मुझे तो ऐसा लगता है अब तुम्हारे रग-रग में मेरा दिवानापन बढ़ता जा रहा है। अच्छा जी! दिल्ली में कमी है क्या?


पहली ही बार में, पहली ही नजर में मुझे देखकर पागल हो गए। ऐसे तुम जानते हो तुम्हारा खूबसूरत और खतरनाक जिंदगी मुझे पसंद है। तुम मुझ से बात करना चाहते हो न तो एक शर्त है मेरी। तुम यदि मुझमें अपना कोई रिश्ता पाओ तो मुझे नाम दे सकते हो। जो भी तुम्हें प्रिय लगे। मिसाल के तौर पर बहन जी, भी हो सकता है? यार पागल हो तुम। अभी-अभी आई हो और दिमाग खराब करने लगी। किसी दूसरे दिन पूछ लेना। अब नाराज मत होना। और एक बात और सुन कर जाओ जमाना खराब है, 'नकाब' लगा कर निकला करो। अपने चेहरे पर खूबसूरती बिखरते हुए बोली पागल 'रोलू'। कल बताता हूं। मेरी 4 बजे की बस छूट जाएगी।।

अगला अंक बहुत जल्द !!!

सोमवार, मार्च 2

पटियाला "तू " न गई मेरे मन से!!! (अंक -2)


अजीब दास्तां है ये! समझ में नहीं आता कि मैं इस कहानी को दोबारा कहां से शुरू करू। पटियाला की फिजा से या उस 'नजमा' की फरियाद से। यकीन मानिए अब तो वह बिल्लियों की

लड़ाई से ज्यादा नोंक-झोंक करने लगी थी वो!

इसे खुदा की कुदरत कहिए या पटियाला शहर(उसकी)की मेहरबानी मैं तो सिर्फ उससे 'पटियाला सलवार' 'पटियाला पैग' के बारे जिक्र किया था। लेकिन अब तो वह देश-दुनिया से लेकर

खुद को जानने की भी कोशिश करने लगी। मैं इसे उसका अनूठेपन मानू या कोई मंसूबा, गफलत,चालाकी, प्यार, मुहब्बत, इश्क, दोस्ती, वफा या उसकी इमानदारी। मुझे कुछ भी समझ

में नहीं आ रहा था। उसका कहने का सलीका भी कुछ-कुछ पहले के मुकाबले बदल गया था। देखते देखते चंद दिनों में वह मेरे लिए वह अचरज और प्रशंसा का सबब बन गई।

हालांकि इस बारे में कुछ भी कहना बेहद कठिन था। कहा जाता है कि आज का युग छवि छलावे का युग है। आदमी की पीड़ा, उसके झूठ और फरेब से पूरा सामाजिक तंत्र घिर चुका है।

ऐसे में मेरे सामने अजीबोगरीब स्थिति उत्पन्न हो गई। आखिर मैं पल-पल अपने आपको मुश्किल में फंसता जा रहा था। फिर भी मैं यह सोच कर कुछ नहीं कर पा रहा था कि

संवेदनशील सहित अनेक मुददों और रिश्तों को बताने वाली बातों को सुनने और सहयोग करने में हर्ज क्या है।


अब तो आए दिन नींद में भी महफिल के कहकहों के डूबने का इंतजार किए बिना उनकी खनकदार आवाज गुंजने लगी थी। गंभीर से गंभीर विषयों हो या कोई अन्य वाक्या पर भी उसका

जिक्र करने का दिलचस्प अंदाज का मैं कायल हो चुका था। ऐस में हमेशा अब यही बोलता था , जब कोई बात बिगड़ जाए कोई मुशिकल आ जाए। तुम देना साथ मेरा!! हालांकि इससे

पहले ऐसे-वैसे मौको पर मैं खुदा को याद करता था।

अपनी मजाक की आदत के मुताबिक आखिरकार मैने एक दिन तहजीबी अंदाज में बोल दिया। क्या रखा है पटियाला में? इस बात का जवाब उसने बड़े दिलचस्प अंदाज में दी। जी

"खाकसार का नाम 'नजमा बानो' है। मैं अपने बुरे हाल के बारे में किसी से नहीं बताना चाहती। लेकिन, खुदा तो खर मुसलमॉं, तुमसे शिकवा क्या? अब आप मेरे एक अच्छे दोस्त है।

मैं आपसे इस लिए बात करती हूं कि मैं अपने नाकाम जिंदगी को सब्र दिला सकू । दोस्त मेरे दिल में छुपा दर्द आज भी सर्द नहीं हो पाया है। तुम पटियाला क्या देश-दुनिया के बारे

में बहुत कुछ पूछ सकते हो, लेकिन दोस्त अब मेरे बारे में और ज्यादा मत कुछ पूछना।

मैं तो आसमान से टूटा हुआ तारा हूं। और हां टूटे हुए तारे से प्रकाश की उम्मीद नहीं की जा सकती। जाने-अनजाने अगर मैं कुछ गलत बोल दिया हूं तो माफ करना। अच्छा जी !! यह

बात सुन कर मुझ में अफलातूनी दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। क्या मुसीबत का मारा मुसाफिर ऐसे होते है। अभी-अभी तो जिंदगी की गाड़ी उमंगों की पटरी पर खरपट ढ़ग से दौड़ रही

थी। यह क्या हो गया। मुझे और जानने की भूख बढ़ती जा रही थी। ऐसे में मैंने निहायत संजीदगी से कहा! बदकिस्मत तो मैं भी हूं माशा अल्ला! इस पर वह बोल पड़ी क्यों तुम्हें क्या

हुआ? मैडम आज नहीं कल बताऊंगा! अच्छा जी!!

अगला अंक बहुत जल्द!!