
यह कोई बात 'शाम-ए अवध' की नहीं। बल्कि देश की राजधानी की। जहां क्या-क्या होता है
और क्या न होता है यह बताने की जरुरत नहीं !! क्यों कि यह तो अमूमन कुछ न कुछ हम
सभी को पता है।
लगभग सवा करोड़ की आबादी में यहां भले ही सुबह से लेकर शाम तक इंसान
की जिंदगी में भागम भाग रहती हो। लेकिन रही बात जिन्दगी की शुरुआत की तो ।
जानते है-** नंबर एक **
बात कर रहा हूं मासूम , नाजुक सी ओरत , बहुत खूबसूरत मगर सावली सी की। नाम पूछने पर बताती है अपना 'रजिया बाई'। काम और इस फटे हाल के बारे में पुछने पर वह बोलती है! 'दर्द को दर्द से न देखो, दर्द को भी दर्द शुरू हो जाएगा'।
सूर्य की पहली किरण पड़ने से पहले पेट में पल रहे 7 महीने के गर्भ और मुह बोले बच्चे को लेकर 'आईआईटी' गेट के रेड लाईट पर बाबू लोगों की गाड़ियों पर पोछा मारना शुरू करती हूं। वो भी कब तक रात के सन्नाटे तक।
एक सवाल के जवाब में वह बताती है। या 'खुदा दो पल की मोहलत और दे दे'। कुछ और बाबू लोगों के पास अपनी पेट दिखाकर 2, 4 रुपये जमा कर लूं। इस तेज गर्मी में क्या बाबू लोगों की 'तुम्हारी दर्द की कोई फिकर है'? क्या बोलू जी-
इन बड़े साहबों की दिल में तरस है, तड़प है और बहुत बेचैनी है। मुझको देखने की।
उन्हे भूखे पेट की तरस नहीं उन्हें तो मेरे उठे पेट देखने की ललक है। एक अजीब सी तड़प है मेरे लिए। कोई हंसता है तो कोई आंखे मल मल कर देखने को बेचैन है। मुफ़्त में कहां मिलेगी। बदले में देते है क्या है 1 या 2 रुपये।
वह बताती है-और तो और अगर इन बड़े बाबुओ की भावना को समझों तो क्या बताऊं शर्म आती है बताने में भी।भले ही साहब जी अपनी मेम साहिबा के सामने शर्म करते हो ,जो कि उनकी अपनी है। मगर मेरे इस हालत के बदन के रूप देखने के आगे तो 'साहब लोग' अपना शर्म तो तख्खा पर छोड़ आते है।
इस बुरे हाल के मलाल के बारे में पूछे जाने पर -कुछ देर बेफिक्र दिखाई देने के बाद बोलती है। सब कुछ खुदा पर छोड़ दिया हूं। खुदा को शुक्र है। हर मुसीबत में उसी की याद करती हूं। देखो रेट लाइट हो गया अब जाती हूं। आ रही हूं तब बात करना।
(अगला अंक बहुत जल्द)

