
नोट- भले ही यह कहानी सच के करीब लगे, लेकिन यहां ये कहना लाजिमी है कि इसका किसी लड़की या घटना से सीधे-सीधे कोई लेना देना नहीं है। कहानी में आई घटना का किसी लड़की-विशेष की जिंदगी से मिलना महज एक संयोग हो सकता है!!!
“ एक बेचैनी होती है अब तो तेरे नाम से ” फिर वही वाक्य ! कोई सुन लेगा धीरे धीरे बोलो ..उसदिन प्रेम अपने फ्लैट में अपने पलंग पर लेटा -लेटा टीवी देखता हुआ अपनी किरण यानि मुगली से बात कर रहा था !
बाबू, “ आज फिर क्लास में एक पंगा हुआ ..Delhi के लड़के भी जो है न ” ! OH GOD..!”
क्यों, क्या हुआ !
“ Love in Delhi ” एक्स्कुज मी ..लगता है मैंने आपको कंही देखा है ..लेकिन मै ने तो आपको कंही नहीं देखा ..हम कंही न कंही तो जरुर मिले है ..आप इस से पहले कंहा पढती थी ...?
“ आगे ऐसा बर्ताब मत करना ..आप मुझे समझते क्या हो ..एक लड़की से मिले नहीं की बस सुरु हो गए ..आपकी आवाज जानी पहचानी है .. आपको कंही देखा है ..आपकी सक्ल कुछ कुछ जानी पहचानी लग रही है ..सारी लड़के जो है न इसे तरह के होते है ”!
“ माफ़ करना मेम साहब ..मुझे आपका ए.आर .रहमान का Vande Mataram नहीं सुनना ....ओये बंद कर यह film dialogue...मुझे तो अपने गावो की दादी माँ वाली चंदा मामा की कहानी ही पसंद है ..जानते हो ...उसके बारे में जब मै सोचता हू..यकीन न होगा .. आँखों की हंसी ..दिल में उतर जाती है ..हा हा हा हा ”!
कोशिश करना॥! हां एक बात और ..इस शहर में ऐसा ही .... होता है !...अब हंस क्यों रही हो ..!
प्रेम, “मुझ से जादा मिलोगे तो प्यार करने लगोगे..बाबू तुम अब नींद से जागो ..और मुझ से मिलना बंद करो ..! हा हा हा ” !
फिर अचानक बोली, “ ..हवा की तरह एक -एक दिन बीते जा रहे है ...बाबू ..उफ़ ...तुम भी कितने कमीने हो ! ओह सॉरी कल फिल्म देखी थी .. जुबान पर आ गए ”! ओ ..तो ये बात है !!
प्रेम -यह सब तो चलता है ! तुम अभी नादान हो इस मामले में !
पर किरण “ बस अब तेरी कहानी है ” ...मालूम नहीं यह मेरी क्या मज़बूरी हो गई है ! ओये तू पागल है ! तू इन्सान है या घनचक्कर !
***मुझे नहीं पता.. कल को मै न रहू या तुम न रहो फिर क्या होगा !! ये लाइफ है यू नो ? बोले तो .. कब यंहा से वंहा ..कब कंहा से कंहा .. नासिक, पुणे, बंगलौर, मुंबई और ख्वाहिश "Next stop Delhi"!! लेकिन उसके बाद Next स्टॉप कहां**? हा हा हा !!बेसक तू जो बोल रही है वह ठीक है ॥मगर ।! अगर-मगर कुछ नहीं .. तू अपना सारा प्रॉब्लम मुझे दे !!
यह सुन कर प्रेम .मुस्कुराया और बोला,“ तुम्हे Delhi में ही रहना होगा ! बाबू मै तुम्हारे साथ कम से कम तो दस महीने तो हू ही .. क्यों की इस संस्थान में nine महीने का कोर्से है और अभी तो पंद्रह दिन ही हुए है ” !
प्रेम कुछ सुनाओ.. बोर हो गई अब ..!
सुनो एक छोटी सी कहानी है ...स्कूल के ज़माने की !
बड़ा नासमझ था ... बिलकुल बचपन के दिनों तरह !! आपने भी स्कूल के दिनों में किसी से दोस्ती .. की होगी ..कभी वो आपके लिये भी बेस्ट फ्रेंड हुआ करती होगी ..उसे स्कूल में न देखू तो पूरा दिन बेकार ...और तो और उसके लिये उस से कोई अगर लड़ जाये ..तो उसकी तो खैर नहीं ..!! उस लड़की की तरफ कोई देख ले ....देखने भर से दंगा हो जाता था...! वहां मोहल्ले की लड़कियों ही साथ में पढ़ती थीं ! वो जमाने में अपन की बात ही कुछ और था ..बचपना था और बचपन के दिन थे ..!!
फिर बचपना बिता .. और जवानी आई ...बक्त ने ऐसा खेल खेला ... वो न रही इस दुनिया में .. फिर उजड़े चमन थे... गुल कब खिला पता ही नहीं चला ..अक्ल न आई.! लेकिन मै तो गाव का गवारा था ...बोले तो इस आधुनिक ज़माने में... इस मामले .. बिलकुल नासमझ . वो तो modern थी ..!!! वो नही उसके तरह dipika padukon !
ओह GOD..! ओये तुम मुझ पर बोल रहा है ? बाबू ...जिन्दगी में भला और क्या चाहिए तुम्हे !
किरण .. मुझ से बोल रही हो ! जी आप ही से बोल रही हू ..!
किरण.. किरण ..किरण ....! पागल झापड़ मारूंगी... चल पलट जा .. २ बज गए .. मै भी जा रही हू सोने .. कल बात करते है ..!!
गुड नाईट ..!!
जाने कंहा गए वो दिन ..................वजह सिर्फ एक थी ! वजह सिर्फ थी !
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फोटो गूगल ...
सहजता अच्छी चीज है पर अति हर चीज की बुरी होती है
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