
नोट- भले ही यह कहानी सच के करीब लगे, लेकिन यहां ये कहना लाजिमी है कि इसका किसी लड़की या घटना से सीधे-सीधे कोई लेना देना नहीं है। कहानी में आई घटना का किसी लड़की-विशेष की जिंदगी से मिलना महज एक संयोग हो सकता है!!!
सोचा था इस बात का जिक्र कभी नहीं होगा...कभी नहीं...कभी नहीं !
और इस सच को कोई नहीं बदल सकता लेकिन...आज...!!
स्साला बुड्ढा...भंगार की औलाद... आज पूरा ज्ञान पेलकर ही रहेगा... इसे घर नहीं जाना है तो क्या, मेरा टाइम क्यूं खोटी कर रहा है... वो बड़बड़ा रही है... वो मतलब मुलगी... मुलगी मतलब अपनी किरण ----- क्लास में मन नहीं लग रहा क्योंकि दिमाग तो पीवीआर नाके के पास के हिल टॉप पर है... वहां वो इंतजार कर रहा होगा बेचारा... कभी मोबाइल को निहारती समय देखने के लिए तो कभी प्रोफेसर को देखती कि कब वो क्लास लेना बंद करे...
खैर, लगता है गणपति ने उसकी सुन ली... लेकिन क्लास खत्म करते-करते बुड़्ढे ने ढाई बजा ही दिए...
पता नहीं प्रेम क्या सोचता होगा। अब जानबूझ कर तो मैं लेट हुई नहीं, लेकिन वो मेरी बात क्यों मानेगा, उसे तो मेरी बातें झूठ ही लगेगी।
आटो वाले भैया प्रिया चलोगे, कितना लोगे, जरा जल्दी चलो भैय्या, कोई जेएनयू गेट पर काफी देर से इंतजार कर रहा है। गेट पहुंचने के साथ ही मुल्गी... के माथे पर शिकन साफ झलकने लगी।
उसकी नजरें प्रेम को खोज रही थी। गेट पर प्रेम दिख नहीं रहा था। अचानक मुल्गी की नजर हिल टॉप पर गई। प्रेम बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। प्रेम को देख मुल्गी ने चैन की सांस ली। उसने आटो रुकवाया और प्रेम को आवाज लगाई, “ओ सॉरी बाबू क्लास था तुम तो जानते हो प्रोफेसर कितना खड़ूस है। वो निकलने ही नहीं दे रहा था। हमलोग लेट तो नहीं हुए।”
किरण ....नहीं अभी तो अपन लोग के पास 10 मिनट है। और यहां से पीवीआर प्रिया पहुंचने में पांच मिनट। चलो जल्दी चलो नहीं तो लेट हो जाएंगे।
ओके ..कितनी देर से मेरा इंतजार कर रहे थे ...... बाबू—यही एक दो घंटे से! हे भगवान--- पता है आज खडूस बुढ्डा दिमाग चाट दिया। इसलिए निकलने में देर हो गई।पीवीआर पहुंचने के बाद एक अजीब घटना हो गई। टिकट काउंटर पर बहुत भीड़ थी इसलिए प्रेम ने मुल्गी को टिकट लेने को कहा। पास में ही खड़ी अपने ब्यायफ्रेंड के साथ आई एक लड़की दोनों की बातें गौर से सुन रही थी। उसने दिल को चुभाने वाली बात कह दी। अरे खुद ना जाकर टिकट लाने अपनी गर्लफ्रेंड को भेज दिया।
मुल्गी उसके पास जाकर हिकारत भरी नजर से देखा और कहा, “ इसमें हर्ज क्या है हमारा ज्वांईट एकाउंट है।”
लगभग 10 मिनट बाद दोनों फिल्म “लव आज कल” देखने में मशगूल थे। पूरा हॉल में मद्धिम रोशनी छाई हुई थी। फिल्म से ज्यादा रोमांटिक हॉल का माहौल लग रहा था। रह - रह कर मुल्गी...प्रेम से बात कर रही थी। प्रेम उसके होठों को एकटक निगाह से देख रहा था। हॉल की मद्धम रोशनी में उसकी होंठ कयामत ढा रही थी। हालांकि दिल्ली की मुल्गियों की तरह वह लिपस्टिक नहीं लगाती थी। उसकी होठों की एक अपनी आब थी। प्रेम फिल्म देखने की बजाए टुकटुक को निहार रहा था। मुल्गी पॉपकार्न खाने लगी। पॉपकार्न खाते वक्त उसके होठों के खुलने और बंद होने पर एक अजीब सी ज्योमेट्री आड़ी तिरछी शक्लें बन रही थी।
अचानक मुल्गी प्रेम की तरफ देखते हुए कहा, तुम बोर हो रहे हो बाबू । नहीं... । तो फिर तुम बोल क्यों नहीं रहे हो । यूं ही, ..इस फिल्म को मैं तीन बार देख चुका हूं।
हे भगवान, “ जब तुम इसे तीन बार देख चुके हो तो आने की क्या जरूरत थी। ” तुम नहीं समझोगी छोड़ो इस बात को। नहीं पहले तुम बताओ क्यों आए। अरे छोड़ो ना यार तुम भी पीछे पड़ जाती हो। नहीं तुम बताओ । अरे यार यहां नहीं आता तो तुम्हें निहारता कैसे, तुम समझती नहीं हो तुम मेरी दीपिका हो।
तुम मेरी तुलना दीपिका से मत करो। क्यों तुम्हे बुरा लगा। मुझे मालूम है कि मैं क्या हूं। औऱ तुम मेरे लिए इतना बेचैन मत हो। क्यों ।
ओह गॉड, मैं कोई नशा जैसी कोई चीज नहीं हूं तुम्हारे लिए। तुम .. “ नाउम्मीदों के अंधकार में एक उम्मीद बन गए हो, जबतक मैं दिल्ली में हूं इसे निरर्थक नहीं होने देना। ”
तभी फिल्म के एक सीन ने दोनों की बातचीत पर विराम लगा दिया। मुल्गी बड़ी सावधानी से अपना चेहरा हथेली पर टिका कर टकटकी निगाह से प्रेम की तरफ देखने लगा। अचानक प्रेम मुड़ कर उसकी ओर देखा तो वह खिलखिलाकर हंसने लगी या हंसने की कोशिश करने लगी।
मुल्गी पॉपकार्न खाते हुए चेयर पर रखे उसके हाथ को पकड़ लिया। उसके हाथ की छुवन से प्रेम एकदम से सिहर गया। मुल्गी के छुवन से प्रेम के बदन में करंट लग गया था।
ये देख किरण बोली, “ ओ माई गॉड क्या हुआ... मैं तुम्हारा रेप नहीं करूनगीपागल मत बनो समझीनहीं मालूम, फिर भी क्या पता तुम ऐसा कर सकती हो, अरे नए जमाने की लड़की हो, नासिक, पुणे बंगलौर और मुंबई शहरों में रह कर आई हो। तुम मेरे साथ सिनेमा देखने नहीं डेटिंग पर निकली हो। हा हा हा हा।टुकटुक इस वक्त तुम्हारा चेहरा जैसा हो रहा है, शायद तुम्हारी नीयत ठीक नहीं।
प्रेम की हाथों में पॉपकार्न का पैकेट थमाते हुए बोली अब तो मेरे साथ गुजारे एक सप्ताह हो गए फिर ये नाटक क्यों।ओह, हां जब पहली मर्तबा मिली थी तो भी तुम इतना परेशान नहीं हुए थे।किरण मुझे बुखार है, मुझे ठंड लग रही है। हालांकि प्रेम तुम्हें किस तरह की लड़कियां पसंद है।
क्यों, आई वांट टू नो।
kirna के बार – बार पूछने पर प्रेम ने कहा मुझे एक मुल्गी पसंद है।
जिसे मैं दिल से प्यार करता हूं। और उसका इंतजार कर रहा हूं। मतलब तुम समझ गई होगी। वह कुछ दिन पहले ही मुंबई से दिल्ली आई है। लेकिन बंदे को अपनी औकात पता है इस वजह से उससे अभी तक कहा नहीं है। हालांकि मुझे कुएं में कूदने शौक नहीं। तुम्हें तो पता है मैं रिश्तों को छुपाने में यकीन नहीं करता।
प्रेम...मुझे ऐसा लगता है कि जब हम मुंबई में थे तब हमदोनों के बीच दिल्ली के मुकाबले ज्यादा करीब थे। अब ऐसा लग रहा हैकि हम दोनों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही है। नहीं टुकटुक.....।
यह तुम्हारी सोच हो सकती है।
नहीं....। पहले ये बताओ, जब से मैं दिल्ली आई हूं तुम मुझसे कितनी मर्तबा मिले। कितनी बार मिलने का वायदा किया। उसमें भी तीन बार धोखा दिया। आज मिले हो इतने दिनों बाद। तुम तीन बार धोखा चुके हो। और साकेत पीवीआर में जो हुआ, मैं उसे बताने की जरूरत नहीं समझती हूं।किरण ऐसी बात नहीं है। मेरी भी कुछ मजबूरियां हैं।
जो मैं तुम्हारे साथ शेयर नहीं करना चाहता। वक्त आने पर तुम खुद समझ किरण बोली, प्रेम तुम्हारा इरादा बड़ा शरीफ जान पड़ता है। दिल के बड़े भोले लगते हो। हा हा हा हा ....।
कहीं फुरसत के वक्त काटने या दिल बहलाने का इरादा तो नहीं। इस तरह की बातें कर लड़कियों के सामने रौब मारने का स्टाईल बहुत पुराना हो गया है। जवाब में प्रेम टुकटुक को टकटकी निगाह से देखा।
टुकटुक अपने हाथ से प्रेम का हाथ खींचकर बोली कमाल के इंसान हो। बात करते हो तो दिल में शहनाई बजने लगती है। मैं तुम्हारी तारीफ नहीं कर रही लेकिन बुराई भी नहीं कर रही हूं।
फिल्म खत्म होते ही दोनों एक आटो वाले के पास गए। आटो वाले से टुकटुक ने बहुत अजीब ढंग से बात की। आटो वाले ने जब उसे नया समझ कर जेएनयू होस्टल के लिए 100 रूपए मांगे तो उसने किसी बड़े रियासत की राजकुमारी की अदा से सिर प्रेम की तरफ घुमाई, चेहरे पर गिरते हुए बालों को झटका देकर पीछे की तरफ फेंका और दिल में पल रहे आक्रोश को बाहर निकालते हुए बोली, बाबू आटो वाले अंकल से मिलो, आई 40 रूपए में और जाने का 100 रूपए दो इसे। दिल्ली में भी क्या यार .... आटो वाले भी झिकझिक करने को मजबूर करते हैं।
फिर दोनों दूसरे आटो वाले से बात किया। दूसरा आटो वाला मान गया। दोनों आटो में बैठ होस्टल की ओर चल पड़े। बात करते - करते दोनों जेएनयू गेट पहुंच गए। गेट पर जब दोनों अलगो रहे थे तो दोनों के चेहरे पर एक अजीब पीड़ा और बेचैनी झलक रही थी। कुछ देर पहले की खिलखिलाती हंसी अब उदासी में बदल गई थी। दोनों के चेहरे पर मायूसी साफ झलक रही थी।
दोनों की आंखों ने भी अपनी भूमिका अदा की और नम हो गए। तभी प्रेम ने रूंआसी आवाज में कहा टुकटुक ... हॉस्टल पहुंच कर मैसेज कर देना। उस वक्त प्रेम के चेहरे पर उदासी का मातम छा गया था। जिसका बदन सिनेमा हॉल के एसी के ढंड से कांप रहा था अब वही पसीने से तरबतर हो रहा था।तभी टुकटुक ने नम आंखों से प्रेम को देखती हुई बोली प्रेम तुमने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है। क्या....।
हां प्रेम....तुमने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है। हर रोज सुबह होती है,.....फिर शाम होती है.....हर वक्त सोचो....।।।। बोलो इस मैफियत का नाम क्या है....सारी बातें होस्टल पहुंच कर बताती हूं। प्लीज मेरा फोन रिसीव करना........।।
ठीक है......लेकिन तुम सोने से पहले ही फोन
करना..........।।।।ओके..............हमसफर........।।।।
अगला अंक बहुत जल्द...
फोटो गूगल ...
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