शुक्रवार, जुलाई 10

"नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"!!


नासिक, पुणे, बंगलौर, मुंबई और अब ख्वाहिश "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली"!! नाम रूपा (नाम बदला हुआ) । नाम के मुताबिक शक्ल। ऑखों में बालसुलम चमक। असाधरण हेयर स्टाइल, मोहतरमा की चाल-चलन, हाव भाव बिलकुल परियों की शहजादी जैसी।

शांत महौल। शाम चार बजे का वक्त। संस्थान में उस वक्त ज्यादातर छात्र अपना इंटरव्यू दे कर रूखसत हो चुके थे। बहुत कम छात्र रह गए थे जिनका इंटरव्यू बाकी रह गया था। हालांकि जो रह गए थे उनमें थकान और उदासीनता एक साथ तारी हो चुकी थी।

हर कोई हड़बड़ी में यूं था ऐसा लग रहा हो हर किसी का ट्रेन छूट रही हो। हर कोई अपने स्टॉप पर पहुंचने की जल्दी में हो। लेकिन भीषण गर्मी के बीच संस्थान के गेट के चौराहे पर खड़ी हो कर शायद वो किसी का इंतजार कर रही थी। एक हाथ में बैग और दूसरे में फाइल सहजे इस गेट से उस गेट इस तरह चहलकदमी कर रही थी मानो सुबह के सैर सपाटे पर निकली हो।

तभी उसके उपर नजर पड़ी। यूं तो उससे पहले भी फुर्सत के क्षेणों में उसे ताक रहा था। ताकने का अर्थ उसके प्रति गलत दुश्चिंता नहीं छिपी थी। बल्कि बेचैन कर देने वाली चहलकदमी पर कुछ तरस और कुछ जानने की इच्छा हो रही थी।


उसकी बेचैनी देखकर आखिरकार उत्सुक शुभमुहूंर्त देखकर लेकिन भर्राई आवाज में उसकी स्थिर खामोशी तोड़ते हुए पूछा? क्या आपका इंटरव्यू हो गया?

उसने अत्यंत संयत और सधे हुए लहजे में इंग्लिश की झप्पी मारते हुए बोली, 'यस! क्या आपका इंटरव्यू हो गया। आपका कैसा गया। मैं तो बहुत डर रही थी। लेकिन वैसा कुछ नहीं रहा। हालांकि मेरा एक नहीं दो -दो जगहों पर हुआ है। '

यह सारी बातें एक ही सांस में बोल कर उसने सोचने के लिए मजबूर कर दिया। हालांकि उसे बताया 2005-06 बैच का हूं तो उसने अत्यंत आहिस्ता से बोली सर, क्या आप अपना फोन नम्बर देंगे। मेरा 'नेक्स्ट स्टॉप यू नो .दिल्ली' हीं हैं।


ऐसा लगा वहां पर कुछ बैठे लोग शक कर रहे हैं। वो यह सोच रहे हो लड़का मन बहलाव के लिए पूछ रहा है। हालांकि नजरअंदाज करते हुए पर्स से अपना कार्ड निकाला और थमा दिया। बिलकुल एक शब्द बोली, थैंक्स!! वो भी बेइन्तिहा खुशी जाहिर करते हुए।

फिर बड़े दिलचस्प अंदाज में मुंबईयां स्टाइल में बोली नये शहर के नये महौल में एक अजनबी से बात करने का मजा ही कुछ और है। तभी उसकी गाड़ी आ गई। फिर बोली ओके सर फिर मिलती हूं तो पिछले स्टॉप की कहानी बताऊंगी अभी तो "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली" वाय! टेक केयर!

गुडबाई शहजादी! देखेते देखते यादों के झरोखों में चली गई। आखिर इंतजार है "नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली".का लेकिन उसके बाद नेक्सट स्टॉप कहां*****
फोटो गूगल

2 टिप्‍पणियां:

  1. शराफत एक भोग हुआ सत्य लगता है. कोई नया पत्रकार ऐसा पहलीवार लिखता हो तो उसकी पीठ ठोकनी चाहिए. मेरी शुभ कामनाएं कामयाबी अवश्य मिलनी चाहिए
    अरुण कुमार झा

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  2. शराफत एक भोगा हुआ सत्य लगता है. कोई नया पत्रकार ऐसा पहलीवार लिखता हो तो उसकी पीठ ठोकनी चाहिए. मेरी शुभ कामनाएं कामयाबी अवश्य मिलनी चाहिए आपको
    अरुण कुमार झा

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