शनिवार, जुलाई 4

" आखिर रात के अंधेर में वो कौन है " ! (नजमा पटियाला अंक-9)


अब मैं समझती हूं कि तुम समझ गए होगे कि उस रात उसके मंसूबे क्या थे।
उस दिन के बाद मैं उससे दूरी बना ली। हालांकि उसने बहुत कोशिश की लेकिन अब मैं अब उससे भुलाना चाहती थी।

क्या कुछ समझा नहीं !! ओ हो.,सुनो, 7 मार्च 2009 की देर रात की बात है। अपनी सहेलियों के साथ काली मंदिर से लौट रही थी। तभी एक कोने में कोई नजर आया। हालांकि नजरअंदाज करती हूई दस-पांच कदम आगे बढ़ गई। फिर यह सोच कर पिछे मुड़ी की आखिर रात के अंधेर में वो कौन है !

देखन में चेहरा मासुमियत सा, कुछ देर के लिए मैं यह बोलू कि सूफियत का, अदब इंसानियत का। लेकिन इस रात के अंधेरे में वो भी हाथ में 500 का नोट लहरा रहा हो। यह बात में समझ में नहीं आ रही थी। मकसद क्या हो सकते थे। हालांकि मैं डर रही थी , फिर भी, नजदीक जा कर देखी तो वो दूसरा कोई और नहीं अरुण था।


जानते हो उसके बाद -उसके अपने सफाई में मुझे से क्या बोला !
नजमा -शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए। पीने वाले तो वाकई जिंदगानी ही पीते हैं। यार मैं ने शराब पी ली थी। यू तो पटियला में युवाओं में वक्त वेवक्त मौकों पर यह वाक्य बड़ी ही अनोखे अंदाज में बोली जाती है। हालांकि शराब के वो आदि नहीं कुछ अन्य मामलों में भी वो इस वाक्य को उकेरने से नहीं चुकते। हालांकि उसने चालाकी दिखाने की बहुत कोशिश की।



मैं मानती हूं उसके पहले उस लंपट ,कमीने में अभी दिल्ली और पंजाब छाप लड़कों की तरह उसके पंख नहीं उगे थे। हालांकि देखने में और चाल ढाल से एक समय बड़ा आदर्शवादी था।

हर रात की इच्छाएं मेरे लिए जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन गई थी। शायद तुम समझ गए होंगे। उसे विक्षिप्त मन-स्थिति मानकर उसकी तरफ ध्यान देना ही छोड़ दी थी अब।



तुम जानते हो एक वक्त था जब उसका बचपना और भोलेपन वो एक लम्हा उसकी वो एक नजर ने मेरी जिंदगी के मायने बदल दिए थे, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो चुका था।

उस दिन के बाद ,पैसा, एश्वर्य , संसाधन , रौनक और इनके बीच बेतहाशा भागती जिंदगी के बीच अपनों और गैरों की बईमान नीयत से तंग हो गई थी।

अब तो ऐसा एहसास हो रहा था मानो बाजार की जरूरत के मुताबिक अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए बाजारू औरत बन गई हूं। हालांकि यह बातें गंभीरता से सोचने के बाद ऐसा लगने लगा था। मैं पंजाब की हूं, आजाद ख्याल की हूं। लेकिन इस जमाने के कुछ लोगों से दोस्ती और संवादों के जरिए अब नौसिखिए बाजारू औरत से कम नहीं रह गई थी। यार मेरी जिंदगी में अब बचा क्या है। इस उम्र में सारा उत्साह तो अब धूल चाट रहा है। यह तुम्हें इस लिए बता रही हूं कि अब अपनी मुसलसल दबी हुई इच्छाओं को दबा कर नहीं रखना चाहती।

अगर यह बोलू कि पिछले दो साल की पेशेवर जिंदगी के कुछ खट्टे मिठ्ठे अनुभव और किसी के जीवन के यथार्थ को परोसना अब भारी पड़ने लगा था।


कुछ देर खामोशी के बाद एक बार फिर अपनी कहानी शुरू कि अब ऐसा बहुत कम होता था कि कहीं से गुजरे और लोग पीछे मुड़कर न देखें। हर तरफ से उंगली उठती। अब लोगों के बीच मेरे चरित्र के बारे में यह चर्चा आम हो चुकी थी। यादों को अपना वजूद था, उनमें जो जिन्दगी जी थी, सपने देखे थे, सफर तय किए थे, किले फतह किए थे, सीमायें लांधी थी वक्त वे वेवक्त पार्क की बेंच पर एक दूसरें का इंतजार किया करती थी। सारी बाते अब अब एक यादें बन कर रह गई थी। मेरी जिंदगी की राह अलग राह पर चल रही थी। हालांकि मुझे इस बुरे हालात का मलाल था।

यह लोगों के बीच बोला जाता है कि खतरनाक सपनों का मर जाना अच्छी बात नहीं हैं।
उसने यह बता कर हैरान कर दिया कि मैं उसके बारे में सब कुछ जान गई थी। एक अच्छे दोस्त का मायने क्या होता है उसका बिस्तर गर्म करना भर थी।

जानते हो ,फिर अचानक एक दिन वो बस स्टॉप पर मिल गया और बताने लगा। (अगला अंक बहुत जल्द)***

1 टिप्पणी:

  1. आज प्रथम बार आगमन हुआ, बहुत ही अच्‍छा लगा आपके ब्‍लाग पर आकर, पुंन: आना होगा।

    आपका नम्‍बर नोट कर लिया है, किसी दिन आपकी घंटी बजाऊँगा। :)

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