शनिवार, मई 23

वो तुम से कम "थोड़ी" ही है !!! (पटियाला -"नजमा" अंक -7)


दर्द शक्लों में भले ही अलग-अलग हो दर्द की कसक एक ही जैसी होती है।
रही बात हमारी तो परिवर्तन का दौर तो हरेक की जिन्दगी में आता है और चला
जाता है। कुछ इस अंदाज में अगले दिन सुबह सुबह 9 बजे के करीब आवाज
गूंजी।

और जी, 'नाजिया' से कल रात की बात हुई थी? अंदाजा लगा सकती हो
उलटी खोपड़ी की लड़की से क्या बात हुई होगी। वो तुम से कमतर 'थोड़ी' ही है।
नाजिया तुम्हारी-मन स्थिति का रहस्योद्घाटन कर रही थी।
क्या?
हां ठीक बोल रहा हूं। वो बता रही थी 'बेबसी और बेचारगी' की तस्वीर हो
तुम। उसने तुम्हारी जिंदगी की तल्ख सच्चाईयों को उड़ेल कर रख दी है।
उस वक्त यह बोल कल हंसने लगा था।

मेरे अजीज-मेरी जिन्दगी के रोज-ए हश्र पर मत हंसो। कभी -कभार
हंसी नकारात्मक भावनाओं को बोझिल कर देती है। वक्त -वेवक्त परिस्थितियां
और स्थितियां जीवन में बदलती रहती है।

बुदबुदाते हुए बोली-तुम्हे मेरे प्रति फर्ज की शर्म कब आएगी। पिछले 11
महीनों से कूच-ए दिलदार में आकर मुझ से गुलछरे उड़ा रहे हो और बोलते
हो की मैं तो कुछ जानता ही नहीं हूं।
बिलकुल सही बोली। तुम्हीं बताओं अभी तक कुछ भी बताई है अपने बारे में?

वह व्यथित हो कर बोली यह तो मेरी बदकिस्मती है जो आप से नहीं बताई।
यह बात सुनकर कई तरह की भावनाएं उठना लाजमि था। गहराती वातावरण
की सर्द उदासी की खामोशी तोड़ते हुए बोली।

अजीब धर्म संकट है। हालांकि अपने जीवन के इस असलियत राज को तोड़ना नहीं चाहती
थी लेकिन अब बताना होगा। ठीक है मैं बताती हूं, मगर मेरी 'जगहसाई' मत
करना।

कितना 'नाजुक है मेरा दिल' यकीन करो। मैं न उसके ऊपर कितना विश्वास किया।
उसका नाम 'अरुण' ** था? इतना बोल कर वो चुप हो गई थी।
हालांकि उसे अपने हकीकत बाते बताने में उसकी जिंदगी की तल्ख सचाईयों
से बिलकुल अचरज नहीं हो रहा था। हालांकि उसकी असलियत का अहसास होने के
बावजूद बेफिक्र था। ऐसे में अपने दिल के भावों को शब्दों में पिरोते
हुए लब खोलना ही चाह रहा था कि उसकी फोन की घंटी बजी।

फोन देख कर उसकी गुलाबी चेहरे पर चमकती पसीने की बूंदे लाल गई थी।
बड़ी ही मासुमीयत से बोली मेरी अम्मी का फोन है। मुझे जाना होगा।
बिलकुल उदास मन से यह बोल कर चली गई कि 'अच्छा जी' चलती हूं । उस
'अरुण' के बारे में कल बताऊंगी ।

(अगला अंक बहुत जल्द)**

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