कहावत है कि 'बशिंदे चाहे कितनी भी हो मगर आदतें नहीं छूटती'। लेकिन देश का एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां लोग आतंक के साये में धीरे-धीरे अब अपने अभिवादन के तौर-तरीके को बदलने को मजबूर हो रहे हैं।
बिहार के गया जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर व जगंल-झाड़ के बीच बसा डुमरिया-इमामगंज भारत के अन्य क्षेत्रों से कई मायनो में अलग है। पूरे इलाके में कथित शोषण व अत्याचार के खिलाफ नक्सली सालों से आंदोलन क्षेड़े हुए है। उग्रवाद प्रभावित इस क्षेत्र में लोग अब अभिवादन के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले 'सलाम', 'नमस्ते' 'राम राम' और 'प्रणाम' की जगह 'लाल सलाम' बोलने लगे हैं। नक्सलियों का खौफ ऐसा है कि मानो इनका हर ऐलान देश के कानून के से भी बढ़कर हो।
सूत्र बताते है कि सिर्फ गया जिले का डुमरिया और इमामगंज का इलाका ही नहीं पूरा मगध प्रमंडल क्षेत्र का ग्रामीण इलाका अब इस दस्तूर को अपनाने को मजबूर है। अब इस क्षेत्र में नक्सलवादियों के अलावा और भी कई अन्य उग्रवादी संगठन बन गए है।
क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में किसी अजनवी को देखते ही यहां के लोग 'लाल सलाम' करने लगते है। खुदा न खास्ता अगर वह उस संगठन का आदमी न हो तो वैसे स्थिति में एक बोलेने वाले के साथ भी एक अजीव स्थिति बन जाती है। दरअसल ऐसे में ग्रामीण भी क्या कर सकता है।
दुनिया में यूं तो आतंकवाद और उग्रवाद की घटनाओं की आवाजें अक्कसर सुनाई देती है, लेकिन इस क्षेत्र में एक अवाज हट कर सुनने और बोले जाने से क्षेत्र में आने वाले बाहरी लोगों के सामने भी एक अजीव स्थति बनती दिख रही है।
क्षेत्र का भागोलिक दृश्य ऐसा है मानो दुनिया से अलग हो। क्षेत्र के इलाके में सैकड़ों छोटे बड़े नदियां, घने जंगल और पहाड़ से घीरे होने के कारण अजीव तस्वीर नजर आती है। सिर्फ इतना ही नहीं इलाके के दर्द को बयान करना कोई आसान काम नहीं है।
इस क्षेत्र में यू लगता है फिजां में बदलाव की लहर चल रही है। और इस पनप रहे नए दास्तां को संभ्रात समाज भी मानो बर्दाश्त करने को मजबूर हैं।
सूत्र बताते है कि क्या हिम्मत कि माओवादियों द्वारा किए हुए हर ऐलान का लोग पालन न करे। इस इलाके में जो कोई भी आता है चाहे वह सरकारी आदमी हो या गैरसरकारी उनके द्वारा हर ऐलान को मानने के लिए बाध्य है।
नक्सलियों के खौफ के कारण क्षेत्र में छोटे-मझौले चाय दुकानों से लेकर इलाके में लगने वाले बाजार और मवेशी हाटों में पांच बजते ही मुर्दनी सी छा जाती है।
इस इलाके में लोगों के बीच हांड कंपा देने वाली दास्तानों के लंबी फेहरिस्त है। डुमरिया से 9 किलोमीटर के दक्षिण स्थित भोकहा गांव के एक किसान ने नाम न किसी को बताने के सर्त पर बताया कि बाबू अब तो अब हम लोग के लिए वो लोग सरकार से बढ कर हैं। इलाके के थाने में जाओं कोई फायदा नहीं। कार्यालय में जाओं कोई नहीं सुनता, लेकिन इनके पास जाने से हर काम मिनटों में होता है। आप को क्या बतावू इनके पास से एक दरखास्त से काम चल जाता है। और जानते हैं क्षेत्र में झुग्गी झोंपड़ी में रहने वालों को प्राय: हिमारत की नजर से देखा जाता है। जानते नहीं है बड़े लोगी की सोच गरीब है तो गुनहगार तो हमलोग ही है। और एक बात और है इनकी लड़ाई जल, जंगल और जमीन के लिए है। न कि हम जैसे गरीब लोगों के लिए।
इस इलाके में माओवादियों द्वारा रोज बंद-हड़ताल, हत्या और न जाने अनेक लोगों पर पाबंदियां आम बात है। दूसरी ओर इलाके में सड़क,अस्पताल, बिजली और विद्यालय दूर- दूर तक कोई नामो निशान नही रहने से लोगों की अलग तरह के परेशानी है। इस इलाके की पुलिस थाने की अपनी अलग विशेषता है। पुलिस थाना में तैनाथ पुलिसकर्मी आम जनता की नहीं बल्कि वो खुद अपनी सुरक्षा लिए हमेशा पुलिस थाने में गेट पर ताला लगा कर रखेते है। बहरहाल इन सारी सुविधाओं के न रहने के बावजूद भी इलाके के लोगों में खुशी देखी जा सकती है।
मजे की बात तो सह है कि यह इलाका बिहार विधान सभा अध्यक्ष उदयनारायन चौधरी का है। इसके बावजूद आज भी यहां के लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए है। खौफ के साये में यह इलाका अब अंगड़ाई ले रहा है। क्षेत्र के लोगों में एक अलग तरह का बदलाव देखा जा रहा है। मानो इलोक में नई बयार बह रही है। इस इलाके ने तमाम आशंकाओं को झुठला दिया है। अब लोगों के बीच खौफ के साये में बस, सुनते जाओं करते जाओं ही मात्र एक तरीका है।
******
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें